बस्ती में मनरेगा का 20 अरब का ‘कागजी’ खेल: न मजदूर को मिला रोजगार, न गाँव बना मॉडल
विकास का ढकोसला और भ्रष्टाचार की बेलगाम रफ्तार: मनरेगा के पैसों से लड़े जाएंगे विधानसभा चुनाव? बहादुरपुर का 'नंबर वन' भ्रष्टाचार: एफआईआर की परवाह किए बिना जारी है मनरेगा की लूट, 20 अरब के खर्च पर बड़ा सवाल: कागजों में सिमटा मनरेगा, भ्रष्टाचारियों की जेब में गया जनता का पैसा।
अजीत मिश्रा (खोजी)
मनरेगा: विकास का ‘मजाक’ और भ्रष्टाचार का ‘इतिहास’
- पिछले पांच वर्षों में जिले में मनरेगा के नाम पर लगभग 20 अरब रुपये खर्च किए गए हैं।
- इतनी बड़ी धनराशि खर्च होने के बावजूद, जिले में न तो मजदूरों को 100 दिन का रोजगार मिल सका और न ही कोई ग्राम पंचायत ‘आदर्श ग्राम’ का मॉडल बन पाई।
- यह अनुमान है कि इस 20 अरब रुपये में से 75 प्रतिशत से अधिक राशि, यानी लगभग 10 अरब रुपये से अधिक, फर्जी कार्यों और कागजी भुगतान के जरिए भ्रष्टाचारियों की जेब में चली गई।
बस्ती: क्या मनरेगा का उद्देश्य गरीब मजदूरों को रोजगार देना था या स्थानीय ‘बाप-बेटे’ की जोड़ी के लिए भ्रष्टाचार का एक नया ‘इतिहास’ रचना? उजागर किए गए आंकड़े न केवल हैरान करने वाले हैं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर एक तमाचा भी हैं।बस्ती जिले में मनरेगा योजना के कार्यान्वयन में भारी अनियमितताएं और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, भ्रष्टाचार का यह तांडव पिछले पांच वर्षों से जारी है, जिसमें ‘बाप-बेटे’ की एक जोड़ी ने बहादुरपुर ब्लॉक में मनरेगा के धन का खुलेआम दुरुपयोग किया है।
भ्रष्टाचार के मुख्य बिंदु
- बहादुरपुर ब्लॉक का रिकॉर्ड: बहादुरपुर ब्लॉक के ‘बाप-बेटे’ की जोड़ी ने पिछले एक साल में 35.61 करोड़ रुपये खर्च करके भ्रष्टाचार के मामले में ‘नंबर वन’ स्थान हासिल किया है।
- फर्जी भुगतान के आरोप: इन पर आरोप है कि इन्होंने हथियारों के बल पर भुगतान कराया। इन मामलों में दो एफआईआर (FIR) भी दर्ज की गई हैं, और प्रधान संघ ने इनके खिलाफ धरना-प्रदर्शन भी किया है।
- प्रशासनिक और राजनीतिक ढिलाई: शिकायतों के मुख्यमंत्री तक पहुंचने के बावजूद, ये लोग बेखौफ अपना काम जारी रखे हुए हैं। आरोप है कि इन्हें किसी भी तरह की कार्रवाई का डर नहीं है।
विकास के नाम पर बंदरबांट
पिछले पाँच वर्षों के आँकड़ों पर नजर डालें तो जिले में मनरेगा के नाम पर लगभग 20 अरब रुपये खर्च किए गए हैं। सवाल यह उठता है कि यह विशाल धनराशि आखिर गई कहाँ? धरातल पर न तो मजदूरों को 100 दिन का रोजगार मिला और न ही कोई गाँव ‘आदर्श ग्राम’ बन पाया। स्पष्ट है कि यह सारा पैसा केवल कागजों पर खर्च हुआ और एक सुनियोजित ‘फर्जी भुगतान’ का खेल खेला गया।जिले में मनरेगा की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है:
- पिछले पांच वर्षों में जिले में मनरेगा के नाम पर लगभग 20 अरब रुपये खर्च किए गए हैं।
- इस भारी खर्च के बावजूद धरातल पर न तो मजदूरों को 100 दिन का रोजगार मिला और न ही कोई गांव ‘आदर्श’ (मॉडल) बन पाया।
- एक अनुमान के अनुसार, खर्च की गई 20 अरब की राशि में से आधे से अधिक (लगभग 10 अरब रुपये से अधिक) पैसा भ्रष्टाचारियों की जेब में चला गया, और यह सारा खेल कागजों पर फर्जी भुगतान के जरिए हुआ।
बहादुरपुर का ‘नंबर वन’ भ्रष्टाचार
बहादुरपुर ब्लॉक के ‘बाप-बेटे’ की जोड़ी ने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार करते हुए एक साल में 35.61 करोड़ रुपये खर्च कर ‘नंबर वन’ होने का खिताब हासिल किया है। इन पर हथियारों के बल पर भुगतान कराने के मामले में दो एफआईआर (FIR) दर्ज होने और प्रधान संघ के धरने के बावजूद, इन दोनों के हौसले बुलंद हैं। यह प्रशासनिक विफलता नहीं तो और क्या है कि शिकायतें मुख्यमंत्री तक पहुँचने के बाद भी वे बेखौफ अपना काम जारी रखे हुए हैं?अन्य ब्लॉकों में भी मनरेगा का भारी बजट खर्च किया गया है, जिसकी सूची इस प्रकार है:
- कुदरहा: 30.41 करोड़ रुपये।
- परसरामपुर: 32.07 करोड़ रुपये।
- विक्रमजोत: 19.19 करोड़ रुपये।
- रामपुर: 18.35 करोड़ रुपये।
- दुबौलिया: 17.51 करोड़ रुपये।
- रुधौली: 18.38 करोड़ रुपये।
- हर्रैया: 25.26 करोड़ रुपये।
- गौर: 23.10 करोड़ रुपये।
- कप्तानगंज: 19.57 करोड़ रुपये।
- सल्टौआ: 16.16 करोड़ रुपये।
- सदर: 11.26 करोड़ रुपये।
- साऊंघाट: 10.01 करोड़ रुपये।
क्या चुनाव ही है भ्रष्टाचार का असली मकसद?
लेख इस कड़वी सच्चाई की ओर भी इशारा करता है कि मनरेगा का यह धन राजनेताओं के चुनावी खर्च का जरिया बनता जा रहा है। जब किसी प्रमुख को विधानसभा चुनाव लड़ना हो, तो मनरेगा का खजाना उनके लिए खुला हो जाता है। 20 अरब के कुल खर्च में से आधी से अधिक राशि (लगभग 10 अरब से ऊपर) का भ्रष्टाचार होना यह साबित करता है कि सरकारी तंत्र किस कदर भ्रष्टाचारियों की जेब भरने के लिए इस्तेमाल हो रहा है।
चुनावी फंडिंग और मनरेगा का गठजोड़
- मनरेगा का धन चुनावी खर्चों को पूरा करने का माध्यम बनता जा रहा है।
- महादेव विधानसभा चुनाव से साऊंघाट के प्रमुख अभिषेक कुमार और रुधौली के प्रमुख यशकांत सिंह का नाम जोड़ा गया है।
- एक विधानसभा चुनाव में 7 से 10 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकते हैं, जिसकी भरपाई के लिए मनरेगा जैसे सरकारी फंड का सहारा लिया जाता है।
- अभिषेक कुमार ने पिछले पांच वर्षों में 50 करोड़ रुपये से अधिक और यशकांत सिंह ने लगभग 80 करोड़ रुपये मनरेगा में खर्च किए होने का अनुमान है।
इस पूरे भ्रष्टाचार के तंत्र पर न तो सत्ताधारी दल के नेता और न ही विपक्ष के लोग कोई सवाल उठा रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि व्यवस्था में गहरी मिलीभगत मौजूद है।
निष्कर्ष
बस्ती में मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का एक विशाल साम्राज्य बन चुका है। सत्ताधारी दल और विपक्ष के नेताओं की चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि इस खेल में सभी के हित जुड़े हुए हैं। अगर यही हाल रहा, तो जिले का गरीब मजदूर हमेशा हाशिए पर रहेगा और ‘बाप-बेटों’ के विकास का इतिहास भ्रष्टाचार की स्याही से लिखा जाता रहेगा।















